विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों ने देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में नई बहस को जन्म दे दिया है। UGC के ताज़ा दिशा-निर्देशों के अनुसार अब हर यूनिवर्सिटी और कॉलेज में एक ‘इक्विटी कमेटी’ बनाना अनिवार्य होगा। इस कमेटी का मकसद शैक्षणिक परिसरों में समानता, समावेशन और भेदभाव की शिकायतों का समाधान करना बताया गया है।
UGC का कहना है कि इक्विटी कमेटी छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों से जुड़े मामलों में समान अवसर और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करेगी। यह कमेटी विशेष रूप से महिला, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), दिव्यांग और अन्य वंचित वर्गों से जुड़े मुद्दों पर निगरानी रखेगी और संस्थानों को आवश्यक सुझाव देगी।
हालांकि, इन नियमों को लेकर OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) के प्रतिनिधित्व पर कड़ा विरोध सामने आया है। कई शिक्षाविदों और OBC छात्र संगठनों का आरोप है कि नए नियमों में OBC वर्ग को स्पष्ट और स्वतंत्र प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। उनका कहना है कि जब इक्विटी की बात की जा रही है, तो OBC को अलग से शामिल न करना सामाजिक न्याय की भावना के खिलाफ है।
विरोध करने वालों का यह भी तर्क है कि OBC देश की बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है और उन्हें नजरअंदाज करना इक्विटी कमेटी के उद्देश्य को कमजोर करता है। कुछ संगठनों ने UGC से नियमों में संशोधन कर OBC के लिए स्पष्ट प्रावधान करने की मांग की है।
फिलहाल, UGC की ओर से इस विरोध पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण या बदलाव की घोषणा नहीं की गई है। लेकिन बढ़ते दबाव के बीच यह मामला अब शिक्षा नीति से आगे बढ़कर सामाजिक प्रतिनिधित्व और अधिकारों से जुड़ा अहम मुद्दा बन गया है।
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