मिर्जापुर। पूजा-पाठ और मंत्रोच्चार से पहले स्नान करना क्यों जरूरी माना गया है? यह सवाल अक्सर लोगों के मन में उठता है। विंध्यधाम के विद्वान ज्योतिषाचार्य अखिलेश अग्रहरि के अनुसार, शास्त्रों में स्नान को नित्यकर्म का अनिवार्य हिस्सा बताया गया है।
गरुड़ पुराण, मनुस्मृति और एकलव्य स्मृति जैसे ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि बिना स्नान के देव पूजन, जप या हवन करने से पूर्ण फल की प्राप्ति नहीं होती। शास्त्रों के अनुसार स्नान शरीर और मन की शुद्धि का माध्यम है। जब मन शुद्ध होता है, तब भक्ति, एकाग्रता और ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना मजबूत होती है।
ज्योतिषाचार्य का कहना है कि स्नान से केवल बाहरी स्वच्छता ही नहीं, बल्कि आंतरिक पवित्रता का भी अनुभव होता है। जल तत्व को पवित्रता और ऊर्जा का स्रोत माना गया है। स्नान के बाद शरीर में नई चेतना और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे पूजा का प्रभाव बढ़ता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी स्नान को लाभकारी माना गया है। सुबह स्नान करने से रक्तसंचार बेहतर होता है, मानसिक ताजगी मिलती है और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता बढ़ती है। यही कारण है कि स्नान को पूजा का पहला और महत्वपूर्ण कदम माना गया है।

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