महाभारत के सबसे महान और त्यागमयी पात्रों में गिने जाने वाले गंगापुत्र भीष्म की मृत्यु से जुड़ी तिथि को भीष्म अष्टमी के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को आता है। इस दिन धर्म, कर्तव्य और संयम की अद्भुत मिसाल बने भीष्म पितामह का स्मरण किया जाता है।
कुरुक्षेत्र युद्ध के दसवें दिन अर्जुन ने शिखंडी को आगे रखकर भीष्म पर बाणों की वर्षा की। भीष्म का शरीर बाणों से छलनी हो गया, लेकिन वे तत्काल मृत्यु को प्राप्त नहीं हुए। इसका कारण था—इच्छा मृत्यु का वरदान।
भीष्म को यह वरदान उनके पिता राजा शांतनु से मिला था। गंगा से विवाह की शर्तों के कारण भीष्म ने आजीवन ब्रह्मचर्य और सिंहासन त्याग का कठोर व्रत लिया था। अपने पुत्र के इस महान त्याग से प्रसन्न होकर राजा शांतनु ने उन्हें वरदान दिया कि वे अपनी मृत्यु का समय स्वयं चुन सकेंगे।
महाभारत के अनुसार, भीष्म ने युद्धभूमि में ही प्राण त्यागने से इनकार कर दिया और उत्तरायण काल का इंतजार किया। हिंदू धर्म में उत्तरायण को मोक्षदायी काल माना जाता है। उस समय सूर्य दक्षिणायन में था, इसलिए भीष्म लगभग 58 दिनों तक बाणों की
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