Sidhi जिले के विंध्य क्षेत्र की पहाड़ियों में उगने वाला निर्गुंडी पौधा इन दिनों चर्चा में है। स्थानीय लोग इसे औषधीय गुणों से भरपूर मानते हैं और पारंपरिक इलाज में इसका व्यापक उपयोग करते हैं। आयुर्वेद चिकित्साधिकारी डॉ. विपिन सिंह के मुताबिक, निर्गुंडी के पत्तों में कई ऐसे गुण पाए जाते हैं जो सूजन, दर्द और संक्रमण में लाभकारी माने जाते हैं।
डॉ. सिंह ने बताया कि यदि किसी व्यक्ति को लगातार तीन सप्ताह तक रोजाना निर्गुंडी के पत्तों से ‘झलकी’ यानी हवा दी जाए, तो पक्षाघात (पैरालिसिस) के लक्षणों में धीरे-धीरे सुधार देखा जा सकता है। इस प्रक्रिया में प्रभावित अंगों पर पत्तों से नियमित रूप से हवा दी जाती है। ग्रामीणों का मानना है कि इससे नसों में संचार बेहतर होता है और जकड़न कम होती है।
आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से निर्गुंडी में एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-बैक्टीरियल और दर्द निवारक गुण पाए जाते हैं। यही वजह है कि इसका उपयोग जोड़ों के दर्द, सूजन और अन्य शारीरिक तकलीफों में किया जाता रहा है। कई आयुर्वेदिक औषधियों में भी इसे प्रमुख घटक के रूप में शामिल किया जाता है।
हालांकि, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में पैरालिसिस पर इसके प्रभाव को लेकर व्यापक वैज्ञानिक पुष्टि सीमित है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि गंभीर बीमारियों में किसी भी घरेलू या पारंपरिक उपचार को अपनाने से पहले योग्य चिकित्सक की सलाह जरूर लेनी चाहिए।

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